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Author Topic: जड़ से जुड़ने का अहसास  (Read 48 times)
Manoj Singh
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« on: July 12, 2010, 01:54:16 AM »

नौकरी में तबादला एक आम बात है। और इसी सामान्य प्रक्रिया के चक्कर में आकर कई शहरों में काम कर चुका हूं। यह मेरा सातवां राज्य है। आज के युग में जब स्थानांतरण को विभागीय सजा के रूप में लिया जाता है, लेखक होने के कारण यह मेरे लिये फायदे का सौदा रहा। हर पल कुछ नया देखने-जानने की चाहत से उपजी इच्छाशक्ति व मानवीय संवेदनशीलता के कारण स्थानीय तत्वों ने सदा मुझे आकर्षित किया है। लोक संस्कृति अपने मूल रूप में बेहद सरल एवं सहज के साथ-साथ विशिष्ट भी होती है। बाजार की आंधी व इलेक्ट्रॉनिक क्रांति के आने के पूर्व तक, सभ्यताएं प्रकृति को साथ लेकर धीरे-धीरे विकसित होती थीं और अपने साथ संपूर्ण इतिहास को ढोती चलती थीं। तभी तो साहित्य व कला के माध्यम से संदर्भित सभ्यता के विकासक्रम को पढ़ा जा सकता है। इन्हीं सब कारणों से हर नये शहर में जाते ही स्थानीय आम जनता के साथ जुड़ने की कोशिश रहती। मैंने पाया कि ग्लोबलाइजेशन का असर अब भी सतही है और बहुत कुछ बचा हुआ है। विभिन्न शहरों के इन खूबसूरत लम्हो व रोचक अनुभवों को यादों के पन्नों में सजाकर रखा भी है। गाहे-बगाहे यह खजाना लेखन में मददगार होता रहता है। कल्पना की सृजनशीलता में बेहद उपयोगी। समय के साथ उम्र व अनुभव बढ़ता है और व्यक्ति का दृष्टिकोण व्यापक हो जाता है। ऐसे में आदमी कई बार अलग-अलग दृष्टि से देखने लगता है। इसमें कोई शक नहीं भारत में विविधता है। हर प्रांत का अपना रहन-सहन और खान-पान है। हर नयी जगह मैंने इनको अपनाने का प्रयास किया और स्थानीय जीवनशैली में ढल जाने की कोशिश की। इन सबका अहसास दिल से करते हुए दिमाग पर सुनहरे अक्षरों से अंकित कर रखा है।
पंजाब में पिछले कुछ वर्षों से हूं। हमेशा की तरह स्थानीय सभ्यता व लोक संस्कृति से जुड़ने का प्रयास मेरा जारी था। मगर इस बार कुछ विशेष अनुभव हुए। अपने उपन्यास 'बंधन' का अनुवाद पंजाबी भाषा में होने के दौरान अनुवादक ने कथा के संदर्भ को लेकर कई बार चर्चा की। और धीरे-धीरे जाने-अनजाने ही मैं इस महान भाषा एवं गुरुमुखी लिपि से जुड़ने लगा। साहित्यिक गोष्ठियों व चर्चाओं में जाने लगा। स्थानीय साहित्य को सुनकर समझने का प्रयास किया तो पहली बार अहसास हुआ कि मूल भाषा के माध्यम से किसी सभ्यता व संस्कृति को जीने का मजा ही कुछ और है। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे कि तालाब के किनारे बैठकर गर्मी में लोगों को नहाते देखना या फिर खुद तालाब में उतरकर ठंडे पानी में नहाने का आनंद लेना। दोनों अनुभवों में जमीन-आसमान का अंतर होता है।
भाषाएं दो मनुष्य के बीच संवाद-संपर्क का काम ही नहीं करती, यह दिलों में उतरने का माध्यम भी बनती है। दिल से दिमाग को जोड़ने का प्रबंध करती हैं। यह संस्कृति की आत्मा है। सभ्यता की कल्पना-शक्ति, वैचारिक जीवन का केंद्र और बौद्धिकता का आधार। इसमें संवेदना है तभी तो जीवन है और जीने के मायने हैं। ये भावनाओं को संचालित करती है। ऊर्जा व उष्मा प्रदान करती है। युद्ध में सैनिकों को जीतने के लिए बाध्य कर सकती है तो शांति में विकास की सहायक बन जाती है। यह विचारों को न केवल नियंत्रित करती हैं बल्कि उन्हें अर्थपूर्ण बनाती हैं। विचारधाराएं भाषा पर सवार होकर ही अवाम के मन-मस्तिष्क पर राज करती है। यह रुलाती है, यह हंसाती है। जीवन को रंगों से भर देती है। साहित्य ही क्यों, कला-संस्कृति-सभ्यता भाषा के बिना बेजान हैं। संगीत में यह रस भर देती है और नृत्य की तो अपनी भाषा होती है जो अर्थ प्रदान करती है। और हमारा मन स्पंदित होकर झूम उठता है। लिपि भाषा को स्थायित्व प्रदान करती है। समय के पैमाने पर खुद को अंकित करके भाषा को सदा के लिए अमर कर जाती है।
पंजाब का क्षेत्र इतिहास से भरा हुआ है। यह कर्म भूमि है। यहां का जीवन त्याग व बलिदान की लोक-कथाओं से भरा पड़ा है। इसका स्वाद स्थानीय भाषा में भी मिलता है। यही कारण है जो पंजाबी भाषा में कमाल का उत्साह है उमंग है उल्लास है ऊर्जा है। इसे भांगड़ा नृत्य में भी देखा जा सकता है। विपुल साहित्य है। इसमें सिर्फ युद्ध के विनाश व संघर्ष की कहानियों ही नहीं हैं, यहां भी प्रेम है, पीड़ा है, विरह है। जीवन के प्रति तीव्र आग्रह है। जीने की उत्कंठा है। और साथ है मस्ती, जो आधुनिक युग के आते-आते अंतिम छोर तक जाती प्रतीत होती है। इसमें भी जीवन का आनंद है। धर्म है संत है संदेश है। गुरुवाणी और श्री गुरुग्रंथ साहिबजी हैं। यहां के लोक-साहित्य में समसामयिक संदर्भों के हिसाब से समाज की तत्कालीन परिस्थिति का चित्रण देखा जा सकता है। भौतिक विकास की चाहत है तो जालिम व्यवस्था के प्रति विद्रोह भी है। इन सबका सही-सही अनुभव सिर्फ देख-सुनकर नहीं लिया जा सकता। जब तक आप भाषा व लिपि के माध्यम से स्थानीय साहित्य व संस्कृति की आत्मा से नहीं जुड़ेंगे, संबंध सतही होंगे।
इस दौरान पंजाबी के वरिष्ठ उपन्यासकार गुरदयाल सिंहजी से विशेष स्नेह स्वरूप बहुत कुछ सीखने व समझने को मिला। मेरे उपन्यास बंधन के पंजाबी अनुवाद के लिए उनके द्वारा दो शब्द लिखा जाना मेरे लिए गर्व का विषय बन गया। विगत दिवस उपन्यास 'बंधन' का पंजाबी अनुवाद लोकार्पित हुआ। पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला के कुलपति डॉ. जसपाल सिंह एवं भारतीय साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. सतिन्द्र सिंह नूर ने इसका लोकार्पण किया। यह कुछ विशेष अनुभव दे गया। आमतौर पर इस तरह के कार्यक्रम में आने वाले मुख्य अतिथि पुस्तक पढ़ते नहीं। अगर तो अतिथि राजनीतिज्ञ हुआ तो उनसे उम्मीद भी नहीं की जाती लेकिन वरिष्ठ साहित्यकार तो कई बार और गजब करते हैं। बिना पढ़े ही घंटों बोल जाते हैं। कई बार बेचारा लेखक सिर पीटता रह जाता है। कार्यक्रम में लेखक की हैसियत और भीड़ के मिजाज को देखकर बोला जाता है। कभी-कभी बड़ाई के इतने पुल बांध दिए जाते हैं कि अगले दिन लेखक उठने की स्थिति में भी नहीं रहता और फिर कभी नहीं लिख पाता। बहरहाल, मेरे दोनों अतिथियों की बातचीत से मुझे इस बात की तसल्ली हुई कि उन्होंने उपन्यास पढ़ा है। तभी तो दोनों विद्वानों के उद्बोधन से कई विशेष जानकारियां प्राप्त हुईं। विद्वान आलोचक किसी भी कृति के अंदर छिपी हुई भावनाओं को, उद्देश्य को, संदेश को, विचार को, विचारधारा को, किस तरह से नये ढंग से पकड़ते हैं, विश्लेषित करते हैं और फिर उसे खोलकर दुनिया के सामने प्रदर्शित कर देते हैं यह भी एक कला है। यह हर एक के बस की नहीं। डॉ. नूर के इस कथन ने मुझे प्रभावित किया था कि उपन्यास को पढ़ने के दौरान मन में यह ख्यालात आये कि कहानी के नायक ने इतनी पीड़ा को सहते-सहते आत्महत्या क्यों नहीं की? उनके मतानुसार यहां एक तरह का संदेश है। चूंकि नायक संघर्ष करता है जीवन से जूझता है, इसीलिए वह पलायनवादी नहीं है। और यह चरित्र उन युवाओं एवं मजदूर किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकता है जो जीवन से हारकर आत्महत्या करते हैं। डॉ. नूर के इस कथन ने कार्यक्रम में पधारे कई वरिष्ठ पंजाबी लेखकों को सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि लेखक का किसी विचारधारा के साथ पूरी तरह जुड़ा होना कतई जरूरी नहीं। क्योंकि इसके कारण लेखक की स्वतंत्रता व कल्पनाशीलता में प्रभाव पड़ता है। इसमें कोई शक नहीं कि विचारधाराएं दिशा तो देती हैं लेकिन साथ में आपके सोचने व समझने की शक्ति को सीमित भी कर देती हैं। जीवन निरंतर है उसकी समस्याएं भी नित नवीन हैं। विचारधाराओं का सीमित ज्ञान उसे राह नहीं दिखा सकता। सबसे मुश्किल इस बात की होती है कि विचारधारा को मानने वाले उसमें कोई बदलाव नहीं होने देना चाहते। जबकि सृष्टि में सब कुछ परिवर्तनशील है। शायद यही कारण है जो विचारधाराएं समय के साथ या तो मर जाती हैं या अनुपयोगी हो जाती हैं।
डॉ. जसपाल सिंह का कथन मन को शांत करता है। यह सिख धर्म के इस संदेश से प्रभावित लगता है कि सेवा का धर्म में प्रमुख स्थान है। सेवा करने वाले को पैगम्बर का दर्जा दिया जा सकता है। यह सेवाएं देश व समाज के साथ-साथ परिवार में भी हो सकती है। जरूरतमंद, कमजोर, बूढ़े, बच्चे, रोगी आदि-आदि। ये किसी भी रूप में हो सकते हैं। आज के बिगड़ते सामाजिक हालात में, जहां व्यक्ति आत्मकेंद्रित हो चुका है, वहां इस तरह की भावनाएं समाज व व्यवस्था को सकारात्मक रूप से संगठित बनाए रखने में बहुत उपयोगी साबित होंगी। यह चेतना को जाग्रत करती है। मनुष्य के अंदर पनप रहे राक्षसी प्रवृत्ति का नाश करती है।
मुझे यह जानकर थोड़ी हैरानी हो रही है कि पंजाबी साहित्य जितना अपने देश में पढ़ा जाता है उससे कहीं अधिक विदेशों में इसका आकर्षण है। पंजाबी भाषी भाई विश्वभर में फैले हुए हैं। अपने देश से बाहर जाते ही अपनी सभ्यता, संस्कृति, साहित्य और भाषा के प्रति विशेष प्रेम का जन्म लेना, एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस बात का अहसास मुझे हो रहा है। चूंकि अपने उपन्यास की प्रतिक्रियाएं मुझे विदेशों से भी मिलने लगी हैं।
मनोज सिंह
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