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Author Topic: कोलकाता की है बात निराली  (Read 86 times)
Manoj Singh
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« on: May 24, 2010, 01:03:47 AM »

कोलकाता महानगर को मैंने, थोड़े-थोड़े अंतराल में, बचपन से लेकर आजतक, निरंतर देखा है। ऐसे में, आम आदमी की निगाह में दिखाई देने वाले परिवर्तन को मोटे-मोटे शब्दों में परिभाषित करने की कोशिश की जा सकती है। सत्तर के दशक में कम्युनिस्ट व ट्रेड यूनियन मूवमेंट की धुंधली-धुंधली सी यादें हैं। मजदूरों और श्रमिकों के संघर्ष की आवाज सुनाई देती और हड़ताल व लॉकअप और धीरे-धीरे कुछ कारखानों को बंद होते पढ़ा-सुना। यूं तो 1984 में एस्प्लेनेड से नेताजी भवन तक मेट्रो प्रारंभ  हो चुकी थी। मगर अस्सी के दशक में कोलकाता का मुख्य बाजार, टालीगंज से लेकर पीछे दमदम तक का शहर, अंडरग्राउंड मेट्रो के लिए जगह-जगह खुदा पड़ा था। बाद में नब्बे के दशक में पहुंचने पर कोलकाता को अपने मेट्रो पर गर्व होने लगा था। और मेरे लिए यह एक ऐसा अनोखा शहर था जहां सड़कों पर हाथ-ठेला से लेकर काली-पीली एम्बेसडर, बसें और पटरियों पर ट्रॉम एक साथ दौड़ा करतीं तो जमीन के नीचे मेट्रो। तकरीबन सात-आठ वर्ष पूर्व जाने पर वहां की तमाम सैद्धांतिक व्यावसायिक विचारधारा पर प्रश्नचिह्न और तर्क-वितर्क का दौर अपने चरम पर था। इन सब परिवर्तन के बीच भी बंगाल की संस्कृति ने हमेशा आकर्षित किया था और यह अपनी पूरी जीवंतता के साथ उपस्थित थी। सड़कें सपाट हो न हो, गड्ढों के बीच में से जीवन अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रहा था। इसमें रवीन्द्र संगीत भी था तो कला और नृत्य-गायन घर-घर अपनी पूरी उत्कृष्टता के साथ फल-फूल रही थी। साहित्य पठन-पाठन में बंगाल को प्रारंभ से ही विशेष प्रेम रहा है। मिष्ठी-दही की खटास में मिठास, सॉन्देस-मिठाई का हल्का-हल्का मीठापन, सफेद रसगुल्ले का स्पंजीपन और माछेर-झोल का वो सरसों में भीगा स्वाद बरकरार था। गरीबी तो थी लेकिन सभ्यता में समरसता थी। इसमें बेचैनी नहीं थी। जीवन नीचे से लेकर ऊपर तक तकरीबन एक-सा दिखाई देता। कलकता दो शताब्दी पूर्व ही महानगर का रूप अख्तियार कर चुका था, मगर महानगरीय संस्कृति यहां कभी आंखों में खटकी नहीं। मुंबई वाली भागा-दौड़ी महसूस नहीं होती और दिल्ली का राजनीतिक मिजाज यहां अनुपस्थित था। मुंबई के लोकल की रफ्तार और कोलकाता के ट्राम की गति में उपस्थित विरोधाभास से ही इसे समझा जा सकता है। मूल रूप से देखें तो पूजा और पर्यटन के लिए जाना जाने वाला बंगाली समाज, थोड़े में भी संतुष्ट और संपूर्ण जीवन जी लेता। गुण-अवगुण तो सभी में होते हैं मगर यहां की बौद्धिक क्षमता पर कभी किसी को शक नहीं रहा।
विगत सप्ताह एक बार फिर कोलकाता जाना हुआ। एयरपोर्ट से लेकर पार्क स्ट्रीट तक पहली नजर में ही शहर बदला-बदला सा नजर आ रहा था। सड़कें व्यवस्थित हुई थी और गड्ढे नदारद थे। तेज भागती महंगी और आलीशन गाड़िया देखकर आश्चर्य हुआ। सड़कों के किनारे ऊंची-ऊंची गगनचुम्बी इमारतें, कंक्रीट के बनाये गए माचिस के डिब्बेनुमा फ्लैट के जंगलों को देखकर मैं हैरान था। शेक्सपीयर सरणी व कॅमाक स्ट्रीट से लेकर दक्षिण कोलकाता तक ब्रांडेड शोरूम और मॉल्स की संस्कृति  चारों ओर बिखरी हुई थी। फास्टफूड और पश्चिमी संस्कृति ने अपने पैर जमा दिए थे। आईटी सेक्टर और कंप्यूटर कल्चर की चकाचौंध इतनी तेज थी कि यहां की सड़कों और बंगलुरू, हैदराबाद या दिल्ली-मुंबई के बीच फर्क कर पाना मुश्किल हो रहा था। आदमी को दृश्य से हटा दें तो इन कंक्रीट की दीवारों ने सब एक-सा कर दिया है।
कालीघाट मंदिर में श्रद्धालुओं के भीड़ की अपनी रफ्तार बनी हुई थी। हां, बकरे की बलि का क्रम कुछ कम होता जरूर लगा था। दुर्गा मां हमेशा मेरे लिए शक्ति का स्रोत रही हैं और इस बार भी उनके दर्शन कर मैं ऊर्जा से भर गया। मंदिर से बाहर निकला तो दूसरे छोर पर स्थित बूढ़ी गंगा के दर्शन कराए गए। दृश्य देखकर मैं अवाक्‌ था। पूर्व में नाते-रिश्तेदारों और दोस्तों ने इसे क्यों नहीं दिखाया? शायद यह उनकी निगाह में महत्वपूर्ण न हो। सच है, इसे सामान्य रूप में देखना, वर्तमान युग के पर्यटन में शामिल नहीं। अधिक तो नहीं जान पाया मगर बहुत देर तक तो मैं इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं हुआ कि पूर्व में वास्तविक गंगा की एक शाखा यह भी थी। अब यह किसी गंदे नाले से ज्यादा कुछ नहीं। सुनाई गई कहानी कितनी सत्य है, कहा नहीं जा सकता। जिस युग में दूसरे दिन के अखबार में छपी खबर और आंखों देखी घटना में फर्क आ जाता हो वहां इतिहास के मानवीय प्रस्तुतीकरण में सदा से अविश्वसनीयता बनी रहती है। चाहे जो हो, मगर यह इस बात का प्रमाण तो है ही कि मानव अपनी सभ्यता के विकास नाम से अपने ज्ञान को आधुनिक होने का जितना भी डंका पीटे मगर उसने नैसर्गिक सौंदर्य का भरपेट सत्यानाश किया है। चर्चा के दौरान पता चला कि फ्रांसीसी और अंग्रेजों की आपसी खींचतान में गंगा के इस प्रवाह को दूसरी ओर मोड़ दिया गया जिसके कारण हुगली नदी ने बंगाल की खाड़ी के लिए दूसरा रास्ता अपनाया। बहरहाल, गंगा की इस पवित्र शाखा की इस कदर दुर्गंधभरी दुर्दशा होगी, मेरी कल्पना से परे है। ऐसे दृश्य हिन्दुस्तान के हर शहर में मिल जाएंगे। गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक हर शहर में गंगा मैली हुई है। जबकि ये हमारी आस्था की नदी है, पूजनीय है। इन सबके बावजूद हमें यह स्वीकार करने में तकलीफ होती है कि चमकीले कांच से ऑलीशान इमारतों को बनाने वाली सभ्यताएं ठीक उसी तरह से कार्य करती हैं, जिस तरह से एक बीमार व्यक्ति अपने कमजोर व पीले पड़ चुके चेहरे को मेकअप से छुपाकर सुंदर बनाने की कोशिश करता है। पैसे वाले लोग, आभूषणों से अपनी बदसूरती को ढक लेते हैं और इत्र से बदबू को दबा देते हैं।
कोलकाता को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर पर गर्व है। और यह आज भी दिखाई देता है। बंगाल गुरुदेव की 150वीं जन्म की वर्षगांठ मना रहा है। रवीन्द्र सदन में संगीत प्रेमियों की चहल-पहल दिखाई दी थी। चौराहों पर उनके पोस्टर विद्यमान थे। कोलकाता ने देश की राजधानी होने का हक 1912 में जरूर छोड़ दिया हो मगर साहित्य की राजधानी होने का दर्जा उसका आज भी बरकरार है। सारी विषमताओं और विपत्ति के बावजूद यहां का पुस्तक मेला अपना आकर्षण बनाए हुए है। यही वह शहर है जिसने अगर असंख्य गरीब और सोनागाच्छी जैसे सेक्स वर्करों का एक विशाल मोहल्ला दिया तो साथ ही सेवा की मूर्ति मदर टेरेसा भी दीं। मैं सौभाग्य से इस बार महाश्वेता देवी के दर्शन कर पाया। यकीन से कह सकता हूं कि इस कद का कोई भी अन्य लोकप्रिय लेखक-लेखिका, आज की तथाकथित आधुनिक दुनिया में इतने सामान्य ढंग से नहीं रह सकता। दो कमरे का एक छोटा-सा फ्लैट, जिसमें सामान उतना ही था जितने की जरूरत एक इंसान को हो सकती है। वो भी अस्त-व्यस्त अर्थात महत्वपूर्ण नहीं। जिस सहजता व नम्रता से उन्होंने हमें बिठाया वहां आत्मीयता थी फिर आतिथ्य की आवश्यकता नहीं रह जाती। उनके पैरों में सूजन को देखकर मुझे हैरानी थी कि इतने शारीरिक कष्ट के बाद भी वे इतनी सक्रिय कैसे? कमरे में दो कुर्सियों के अलावा एक टेबल जिस पर किताबों का अम्बार। चारों ओर बिखरी धूल के बीच में रहकर ही वे मिट्टी से जुड़े गरीब के बारे में इतनी विश्वसनीयता से लिख पाती हैं। वातानुकूलित कमरे में बैठकर गांव की परिस्थितियां नहीं समझी जा सकती और मेरा मन ऐसे कथाकार के लिए आदर से भर गया। यह शायद, यहां की मिट्टी में शक्ति है जो अन्य राजनीतिक नेतृत्व में भी इसी तरह की सादगी के कई मिसाल मिल जाएंगे। यहां किसी एक का नाम लेने पर राजनैतिक पक्षधर कहलाए जाने से बचने की बात महत्वपूर्ण नहीं, लेकिन यह भी सत्य है कि अवाम ने यहां उसी को अपने कंधे पर बिठाया है जो उनकी तरह ही सीधी-सादी जिंदगी जीता हो।
बंगाल की संस्कृति, सभ्यता व सौंदर्य का मैं प्रशंसक रहा हूं। यहां की महानगरीय संस्कृति में घरों के आसपास पेड़ और मोहल्लों के बीच में तालाब का होना एक पहचान रही है। लाल बॉर्डर वाली हल्के रंग की साड़ियों में यहां की नारी सौंदर्य का अपना विशिष्ट आकर्षण है। धोती-कुर्ता में बंगाली भद्रपुरुष अपनी तमाम मानवीय वैचारिक व राजनैतिक प्रतिबद्धताओं के साथ खड़ा रहा। बंगाल ने दशकों तक हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री पर भी शासन किया और एसडी व आरडी बर्मन के साथ-साथ हेमंत दा, ऋषिकेश मुखर्जी, सत्यजीत राय ही नहीं अन्य गैर-बंगाली कलाकारों के चरित्र में भी बंगाली व्यक्तित्व दिखाई पड़ता। 'सफर', 'आनंद' और 'अमर प्रेम' का काल हिन्दी सिनेमा का स्वर्णिम युग कहलाया। 'देवदास' और 'परिणिता' आज भी सिल्वर स्क्रीन पर धूम मचा देती हैं। शरदचंद्र और बकिमचंद्र का कोई जोड़ नहीं। कोलकाता को सत्रहवीं शताब्दी में अंग्रेजों ने बसाया या नहीं? तर्क व ऐतिहासिक संदर्भ की प्रमाणिकता का विषय हो सकता है। मगर मैं इस बात को सोच-सोच कर सदैव हैरान रहा कि अंग्रेजों के आधिपत्य वाले इस महानगर में ब्रिटिश राज के दौरान भी अंग्रेजीयत आमजन में दिखाई नहीं देती थी। तमाम संक्रमण के बावजूद स्थानीय जीवन ने अपनी पहचान कायम रखी थी और शायद तभी वैचारिक व स्वतंत्रता संग्राम के बीज यही अंकुरित हो रहे थे। वैसे टैगोर खानदान के परदादाओं ने बहुत पहले ही समुद्र पार कर लिया था तो रामकृष्ण परमहंस के परम शिष्य विवेकानंद विश्व में धूम मचा आए थे। मैं ऐसी सभ्यता के सामने नतमस्तक हो जाता हूं, जिसने नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसा नेतृत्व देश को दिया। लेकिन इस बार की मेरी संक्षिप्त यात्रा ने मेरे इस वैचारिक विश्वास व यादों के धरोहर को ध्वस्त तो नहीं मगर हिला जरूर दिया। मैं भयभीत हूं कि आधुनिकीकरण की तेज आंधी इस विशिष्ट पहचान को कब रेत की दीवारों की तरह ढहाकर उड़ा ले जाएगी, पता ही नहीं चलेगा। मैं नहीं चाहता कि माछ-भात और सफेद रसगुल्ले व सॉन्देस-मिठाई का व्यवसायीकरण हो और यह किसी ब्रांड में ढाल दिये जाएं। डर है कहीं ढाब (नारियल का पानी) बोतलों के अंदर नीले-पीले रंग में बंद न कर दिया जाए। मिट्टी के कुल्हड़ में मिष्ठी-दही की सौंधी खुशबू बरकरार रहे, ऐसी उम्मीद करता हूं।

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